शाह आलम कैम्प की रूहें
असगर वजाहत
३
शाह आलम कैम्प में आधी रात के बाद रूहें आती हैं। रूहें अपने बच्चो के लिए स्वर्ग से खाना लाती हैं,पानी लाती हैं ,दवाएं लाती हैं और बच्चों को देती हैं। यही वजह है कि शाह आलम कैम्प मे न तो कोई बच्चा नंगा भूखा रहता है और न बीमार । यही वजह है कि शाह आलम कैम्प बहुत मशहूर हो गया है। दूर दूर मुल्कों मे उसका नाम है।
दिल्ली के एक बडे नेता जब शाह आलम कैम्प के दौरे पर गए तो बहुत खुश हो गए और बोले --ये तो बहुत बढ़िया जगह है...यहाँ तो देश के सभी मुसलमान बच्चों को पंहुचा देना चाहिऐ।"
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Sunday, June 10, 2007
Saturday, June 9, 2007
त्रिशूल पर टंगे बच्चे की मां
असगर वजाहत
शाह आलम कैम्प की रूहें
2
शाह आलम कैम्प मे आधी रात के बाद एक औरत की घबराई बौखलाई रूह पंहुची जो अपने बच्चे को तलाश कर रही थी। उसका बच्चा न उस दुनिया मे था न वह कैम्प मे था। बच्चे की मां का कलेजा फटा जाता था। दूसरी औरतों की रूहें भी सी औरत के साथ बच्चे को तलाश करने लगीं। उन सबने मिलकर कैम्प छान मारा ....मोहल्ले गयी....घर धूं धूं करके जल रहे थे। चुंकि वे रूहें थीं इसलिये जलते मकानों के अन्दर घुस गयीं....कोना कोना छान मारा लेकिन बच्चा न मिला।
आख़िर सभी औरतों की रूहें दंगाइयों के पास गई। वे कल के लिए पैट्रोल बम बना रहे थे। बंदूकें साफ कर रहे थे। हथियार चमका रहे थे। बच्चे की मां ने उनसे अपने बच्चे के बारे मे पूछा तो वे हंसने लगे और बोले - अरे पगली औरत , जब दस दस , बीस बीस लोगों को एक साथ जलाया जाता है तो एक बच्चे का हिसाब कौन रखता है ? पड़ा होगा किसी राख के ढ़ेर मे। "
मां ने कहा -- नही, नही मैंने हर जगह देख लिया है....कही नही मिला । "
तब किसी दंगाई ने कहा--अरे ये उस बच्चे की मां तो नही जिसे हम त्रिशूल पर टांग आये हैं।
शाह आलम कैम्प की रूहें
2
शाह आलम कैम्प मे आधी रात के बाद एक औरत की घबराई बौखलाई रूह पंहुची जो अपने बच्चे को तलाश कर रही थी। उसका बच्चा न उस दुनिया मे था न वह कैम्प मे था। बच्चे की मां का कलेजा फटा जाता था। दूसरी औरतों की रूहें भी सी औरत के साथ बच्चे को तलाश करने लगीं। उन सबने मिलकर कैम्प छान मारा ....मोहल्ले गयी....घर धूं धूं करके जल रहे थे। चुंकि वे रूहें थीं इसलिये जलते मकानों के अन्दर घुस गयीं....कोना कोना छान मारा लेकिन बच्चा न मिला।
आख़िर सभी औरतों की रूहें दंगाइयों के पास गई। वे कल के लिए पैट्रोल बम बना रहे थे। बंदूकें साफ कर रहे थे। हथियार चमका रहे थे। बच्चे की मां ने उनसे अपने बच्चे के बारे मे पूछा तो वे हंसने लगे और बोले - अरे पगली औरत , जब दस दस , बीस बीस लोगों को एक साथ जलाया जाता है तो एक बच्चे का हिसाब कौन रखता है ? पड़ा होगा किसी राख के ढ़ेर मे। "
मां ने कहा -- नही, नही मैंने हर जगह देख लिया है....कही नही मिला । "
तब किसी दंगाई ने कहा--अरे ये उस बच्चे की मां तो नही जिसे हम त्रिशूल पर टांग आये हैं।
शाह आलम कैम्प की रूहें
असगर वजाहत
1
शाह आलम कैम्प मे दिन तो किसी न किसी तरह गुजर जाते हैं लेकिन रातें क़यामत की होती हैं। ऎसी नफ्सी-नफ्सी का आलम होता है कि अल्लाह बचाए। इतनी आवाजें होती हैं कि कान पडी आवाज़ नही सुने देती। चीख पुकार , शोर गुल , रोना चिल्लाना , आहें , सिसकियां ......
रात के वक़्त रूहें अपने बाल बच्चों से मिलने आती हैं , उनकी सुनी आंखो मे अपनी सूनी आंखें डालकर कुछ कहती हैं। बच्चो को सीने से लगा लेटी हैं। जिंदा जलाये जाने से पहले जो उनकी जिगरदोज़ चीखें निकली थीं वे पृष्ठभूमि मे गूंजती रहती हैं।
सारा कैम्प जब सो जता है , उन्हें इंतज़ार रहता है अपनी माँ को देखने का.....अब्बा के साथ खाना खाने का।
कैसे हो सिराज ? अम्मा की रूह ने सिराज के सर पर हाथ फेरते हुए कहा।
तुम कैसी हो अम्मा ?
माँ खुश नजर आ रही थीं बोली - सिराज....अब...मैं रूह हूँ.....अब मुझे कोई जला नही सकता। "
अम्मा...क्या मैं भी तुम्हारी तरह हो सकता हूँ ? "
1
शाह आलम कैम्प मे दिन तो किसी न किसी तरह गुजर जाते हैं लेकिन रातें क़यामत की होती हैं। ऎसी नफ्सी-नफ्सी का आलम होता है कि अल्लाह बचाए। इतनी आवाजें होती हैं कि कान पडी आवाज़ नही सुने देती। चीख पुकार , शोर गुल , रोना चिल्लाना , आहें , सिसकियां ......
रात के वक़्त रूहें अपने बाल बच्चों से मिलने आती हैं , उनकी सुनी आंखो मे अपनी सूनी आंखें डालकर कुछ कहती हैं। बच्चो को सीने से लगा लेटी हैं। जिंदा जलाये जाने से पहले जो उनकी जिगरदोज़ चीखें निकली थीं वे पृष्ठभूमि मे गूंजती रहती हैं।
सारा कैम्प जब सो जता है , उन्हें इंतज़ार रहता है अपनी माँ को देखने का.....अब्बा के साथ खाना खाने का।
कैसे हो सिराज ? अम्मा की रूह ने सिराज के सर पर हाथ फेरते हुए कहा।
तुम कैसी हो अम्मा ?
माँ खुश नजर आ रही थीं बोली - सिराज....अब...मैं रूह हूँ.....अब मुझे कोई जला नही सकता। "
अम्मा...क्या मैं भी तुम्हारी तरह हो सकता हूँ ? "
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