ब्रिटिश हुकूमत ने तो भगत सिंह को फांसी दी ही थी, आजाद भारत की सरकारें - कोंग्रेस, संयुक्त मोर्चा से लेकर संघी - भगवाधारियों तक ने भी उनके विचारों की हत्या करने मे कोई कसर नही छोडी है। बावजूद इसके,यह सच्चाई है कि भगत सिंह भारतीय जनता के दिलों मे सच्चे राष्ट्र नायक के रुप मे स्थापित हैं। यह केवल किसी विशेष विचारधारा के लोगों की सोच नही है वरन सत्ता प्रतिष्ठान के लोगों को भी इसे स्वीकार करना पड़ा है - हाल के दिनों मे बंदी भगत सिंह पर फ़िल्में, मिडिया मे उनपर हुई लोकप्रिय प्रतिक्रिया और कुलदीप नय्यर जैसे उदार बुद्धिजिवियों द्वारा संसद के केंद्रीय हाल में उनकी फोटो लगाने की माँग इसी तथ्य की पुष्टि करती हैं।
दरअसल भगत सिंह का हमारे राष्ट्रिय इतिहास मे जो सही स्थान है, उससे वंचित करके भारतीय शासकों ने उनके समझौता विहीन साम्राज्य विरोधी रैडिकल सोच तथा मेहनतकश जनता के प्रति उनकी पक्षधरता , उनके समाजवादी- मार्क्सवादी वैचारिक रुझान को जनता से छुपाने की कोशिश की।
सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा भगत सिंह का यह अपमान केवल हमारी एतिहासिक विरासत का ही अपमान नही है , यह एक नए जनवादी खुश हाल भारत के निर्माण के शहीदों के सपने से विश्वास घात भी है। यह बात तय है कि साम्राज्यवादी शिकंजे से पूरी तरह मुक्त आत्मनिर्भर,शोषण विहीन ,आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र के निर्माण की जंग के परचम पर राष्ट्रिय नायकों की सूची मे जो नाम सबसे ऊपर अंकित होगा, वह शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का होगा।
साभार - लाल बहादुर सिंह
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Friday, June 8, 2007
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