Sunday, June 10, 2007

इक्कीसवीं सदी के बच्चे

हेमंत कुमार

जन बच्चों की/गूंजी पहली किलकारी
शरणार्थी कैम्पों मे
जिसने देखा/अपनी मासूम आँखों से
धू धू कर जलते/अपने गाँव/अपनी बस्ती/अपना
घर
मां का बर्बर बलात्कार
धर्मांध/पैशाचिक/अट्टाहसों के बीच
बाप की बूढी आँखों मे/गर्म सलाख्ने
भाई के कलेजे में/लहू पीता त्रिशूल
दुधमुहे की गर्दन/देवमंदिर के चौखट पर
सोचता हूँ बार बार /सोचकर/बेचैन हूँ मैं/लगातार
जब होंगे /ये बच्चे/नौजवान
कहा होगी /इनकी जगह
महामहिम के सपनो के भारत में
उन बच्चों के बीच/जो
सयाने हो रहे हैं/खाते हुए फास्ट फ़ूड
पूछते हैं/विज्ञापन की भाषा में
मुसलमान गुंडे क्यों होते हैं पापा


फोटो साभार :- बी बी सी

1 comment:

अनूप शुक्ला said...

बड़ी कठिन कविता है!